Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
lokmatdaily.in lokmatdaily.in lokmatdaily.in
lokmatdaily.in lokmatdaily.in lokmatdaily.in
  • Home
  • Home
Subscribe
Close

Search

National

उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, शादी से इनकार या ब्रेकअप 'आत्महत्या के लिए उकसाना' नहीं

By
July 17, 2026 6 Min Read
0

<p style="text-align: justify;">उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल प्रेम संबंध समाप्त करना या विवाह से इनकार कर देना भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ ऐसा प्रथमदृष्टया साक्ष्य होना चाहिए, जिससे यह साबित हो कि उसने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया, जानबूझकर सहायता दी या किसी सक्रिय कृत्य के जरिए उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया.</p>
<p style="text-align: justify;">जस्टिस आलोक माहरा की एकलपीठ ने शार्दुल नेगी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए टिहरी गढ़वाल की निचली अदालत का 14 जनवरी 2021 का आदेश रद्द कर दिया. निचली अदालत ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 306 के तहत आरोप तय किए थे. हाई कोर्ट ने आरोपी को मुकदमे की कार्यवाही से मुक्त करते हुए सेशन ट्रायल नंबर 23/2020 की कार्यवाही भी निरस्त कर दी.</p>
<p><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/KD4XMO_Dq60?si=gerqBrMxINnOQNYt" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #e03e2d;"><strong><a style="color: #e03e2d;" title="’भारत में नमाज पर लगे पूर्ण प्रतिबंध’, अयोध्या के संत ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा लेटर" href="https://www.abplive.com/states/up-uk/ayodhya-paramhans-acharya-demands-ban-on-namaz-in-india-letter-to-president-droupadi-murmu-3161545" target="_self">’भारत में नमाज पर लगे पूर्ण प्रतिबंध’, अयोध्या के संत ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा लेटर</a></strong></span></p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>स्टाफ नर्स की मौत से जुड़ा था मामला</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">अभियोजन पक्ष के मुताबिक मृतका एक अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में काम करती थीं. आरोपी एक होटल संचालित करता था, जहां अस्पताल के कर्मचारियों के ठहरने की व्यवस्था थी. इसी दौरान दोनों के बीच परिचय हुआ और बाद में प्रेम संबंध स्थापित हो गया.</p>
<p style="text-align: justify;">मृतका के पिता ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि दोनों विवाह करना चाहते थे, लेकिन बाद में आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया. अभियोजन का दावा था कि इस इनकार के बाद महिला अवसाद में चली गई और उसने मिडाजोलम दवा की अधिक मात्रा लेकर आत्महत्या कर ली.</p>
<p style="text-align: justify;">मामले की जांच के दौरान मृतका के पिता, मां, भाई और अन्य लोगों के बयान दर्ज किए गए. पोस्टमार्टम के बाद विसरा भी सुरक्षित रखा गया. जांच पूरी होने पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धारा 306 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>आरोपी ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">टिहरी गढ़वाल के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 14 जनवरी 2021 को आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप तय कर दिया था. इसके खिलाफ शार्दुल नेगी ने हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की.</p>
<p style="text-align: justify;">आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि अभियोजन की पूरी कहानी को सही मान लिया जाए, तब भी धारा 306 के आवश्यक कानूनी तत्व पूरे नहीं होते. बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपी पर केवल शादी से इनकार करने का आरोप है. रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह लगे कि उसने मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया, जानबूझकर सहायता की या कोई सक्रिय भूमिका निभाई.</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं शिकायतकर्ता पक्ष ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं. यह भी दलील दी गई कि मुकदमे की सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है और अधिकांश गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं, इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>धारा 306 के लिए क्या जरूरी है?</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">हाई कोर्ट ने फैसले में बीएनएस की धारा 306 और धारा 107 का विस्तार से उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है, जब आरोपी ने किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाया हो, किसी साजिश में भाग लिया हो या जानबूझकर उसकी सहायता की हो.</p>
<p style="text-align: justify;">कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल प्रताड़ना, भावनात्मक परेशानी, संबंध टूटना या विवाह से इनकार करना पर्याप्त नहीं है. आरोपी की ओर से ऐसा सकारात्मक और सक्रिय कृत्य होना चाहिए, जिसका आत्महत्या से सीधा या निकट संबंध हो.</p>
<p style="text-align: justify;">अदालत ने कहा कि किसी आरोपी पर धारा 306 लगाने के लिए उसकी मंशा यानी &lsquo;मेंस रिया&rsquo; भी रिकॉर्ड से सामने आनी चाहिए. यह दिखना चाहिए कि आरोपी का उद्देश्य या उसका आचरण पीड़ित को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाला था.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया. इनमें अमलेंदु पाल उर्फ झंटू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और प्रकाश एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे मामले शामिल हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इन फैसलों के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उकसावे का प्रमाण जरूरी है. आरोपी का ऐसा सक्रिय आचरण होना चाहिए, जिसके कारण मृतक के सामने आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा विकल्प न बचा हो.</p>
<p style="text-align: justify;">कोर्ट ने कहा कि केवल यह आरोप कि किसी व्यक्ति के व्यवहार से मृतक परेशान या अवसादग्रस्त था, धारा 306 लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है. कथित उकसावे और आत्महत्या के बीच निकट संबंध होना भी जरूरी है.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>पुलिस पर धारा 306 के जल्दबाजी में इस्तेमाल की टिप्पणी</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">हाई कोर्ट ने फैसले में पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि धारा 306 का कई मामलों में बहुत आसानी और जल्दबाजी में इस्तेमाल किया जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">कोर्ट ने कहा कि genuine यानी वास्तविक मामलों में दोषियों को छोड़ा नहीं जाना चाहिए, लेकिन केवल मृतक के परिवार की तत्काल भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए किसी व्यक्ति को ऐसे मुकदमे में नहीं फंसाया जा सकता, जिसके कानूनी तत्व ही पूरे न होते हों.</p>
<p style="text-align: justify;">अदालत ने कहा कि आरोपी और मृतक के व्यवहार, उनके बीच हुई बातचीत और घटना से पहले की परिस्थितियों को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए. रोजमर्रा के जीवन में कही गई अतिशयोक्तिपूर्ण बातों को बिना किसी अतिरिक्त सामग्री के आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>निचली अदालतों को भी दी सख्त नसीहत</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को भी आरोप तय करते समय अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी. अदालत ने कहा कि निचली अदालतों को &lsquo;प्ले इट सेफ सिंड्रोम&rsquo; अपनाते हुए यांत्रिक तरीके से आरोप तय नहीं करने चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">कोर्ट ने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने धारा 306 के आवश्यक तत्वों की अनदेखी की है, तब भी अदालत का दायित्व है कि वह रिकॉर्ड को सावधानी से परखे. किसी आरोपी को केवल इसलिए लंबे मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल कर दिया है.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>आरोपी के खिलाफ नहीं मिला कोई सक्रिय कृत्य</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन के पूरे मामले को सही मान लेने के बाद भी रिकॉर्ड से सिर्फ यही सामने आता है कि आरोपी ने कथित रूप से विवाह से इनकार किया था. इसके अलावा कोई ऐसी सामग्री नहीं मिली, जिससे साबित हो कि उसने मृतका को जानबूझकर उकसाया, सहायता दी या आत्महत्या के लिए प्रेरित किया.</p>
<p style="text-align: justify;">जांच के दौरान दर्ज बयानों में भी आरोपी के किसी स्पष्ट सक्रिय कृत्य का उल्लेख नहीं था. अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में धारा 306 के तहत आरोप तय करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>आरोपी को मुकदमे से किया मुक्त</strong></h3>
<p style="text-align: justify;">सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाई कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ मामला आधारहीन माना. अदालत ने टिहरी गढ़वाल की निचली अदालत का आरोप तय करने वाला आदेश रद्द करते हुए आरोपी को मुकदमे से मुक्त कर दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि बीएनएस की धारा 306 के स्थान पर अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 108 लागू है, जिसे दुष्प्रेरण से संबंधित धारा 45 के साथ पढ़ा जाना है. हालांकि अदालत का मूल सिद्धांत वही रहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में ठोस, सक्रिय और निकट संबंध वाला आचरण साबित होना जरूरी है.</p>
<p><span style="color: #e03e2d;"><strong><a style="color: #e03e2d;" title="’हमें जिन्ना नहीं गन्ना पसंद है…’, पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी पर जमकर बरसे CM योगी" href="https://www.abplive.com/states/up-uk/cm-yogi-adityanath-attack-samajwadi-party-jinnah-and-ganna-statement-in-bijnor-3161487" target="_self">’हमें जिन्ना नहीं गन्ना पसंद है…’, पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी पर जमकर बरसे CM योगी</a></strong></span></p>

Source

Author

Follow Me
Other Articles
Previous

UP में IPS अधिकारियों के तबादले, रामपुर और ललितपुर समेत कई जिलों में पुलिस कप्तान बदले

Next

केदारनाथ यात्रा पर बारिश की मार, बोल्डर गिरने से 6 घंटे रुका पैदल मार्ग

No Comment! Be the first one.

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

  • किसानों के लिए UP सरकार का तोहफा, इस एक योजना से बदल जाएगी जिंदगी, मिलेगी 90 प्रतिशत सब्सिडी
  • Ganga Expressway: 'टोल टैक्स दो, फ्री में तैराकी करो…' बाढ़ में डूबा गंगा-एक्सप्रेसवे का हिस्सा, लोगों ने लिए मजे
  • न बिजली का तामझाम, न रिमोट…खुद-ब-खुद हिलती-डुलती हैं भगवान कृष्ण और कंस की मूर्तियां, उंगली पर घूमता सुदर्शन चक्र
  • DM ऑफिस परिसर में मौजूद मस्जिद तोड़ा जाएगा, ₹65000000 का जुर्माना बरकरार, कोर्ट का फैसला
  • 'योगी राज में हम सुरक्षित, सपा सरकार में झूठे केस लादकर बनाया जाता था गुंडा', सहारनपुर में RLD की स्वाभिमान रैली में बोले मुस्लिम

Recent Comments

No comments to show.

Archives

  • September 2026
  • August 2026
  • July 2026
  • June 2026

Categories

  • National
Copyright 2026 — lokmatdaily.in. All rights reserved. Blogsy WordPress Theme