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शिमला से दतिया तक रनवे तैयार, लेकिन ‘उड़ान’ गायब:भावनगर में खर्च 18 करोड़ रुपए, कमाई 4 करोड़; 15 एयरपोर्ट पर फ्लाइट बंद

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September 13, 2026 7 Min Read
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शिमला से करीब 22 किमी दूर चीड़ के जंगलों के बीच बना जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट। यहां विमानों का शोर नहीं, सन्नाटा है। पिछली फ्लाइट 27 अगस्त को उड़ी थी। इसके बाद खराब मौसम और धुंध के कारण उड़ानें बंद हैं। पहाड़ों को काटकर बनाए इस एयरपोर्ट पर अब सिर्फ स्टाफ दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 अक्टूबर 2016 को योजना लॉन्च करते हुए कहा था, ‘मैं चाहता हूं कि हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज में बैठे।’ इसके बाद शिमला से ही 27 अप्रैल 2017 को उड़ान योजना की पहली फ्लाइट ने उड़ान भरी थी। उड़ान योजना के 10 साल, 1.68 करोड़ लोगों ने सफर किया उड़ान यानी उड़े देश का आम नागरिक। इस योजना का मकसद ऐसे छोटे और दूरदराज के शहरों को हवाई नेटवर्क से जोड़ना था, जहां रेगुलर हवाई सेवा नहीं थी या बहुत कम थी। केंद्र के मुताबिक, 30 जून 2026 तक इस योजना के तहत, 95 एयरोड्रोम शामिल किए गए। इनमें 76 एयरपोर्ट, 17 हेलीपोर्ट और 2 वाटर एयरोड्रोम भी शामिल हैं। 677 रूट तय किए गए, जिन पर 3.58 लाख उड़ानों में 1.68 करोड़ लोगों ने सफर किया। योजना का मॉडल ये था कि छोटे शहरों के कम यात्री वाले रूट पर शुरुआत में एयरलाइन को फंड दिया जाए, ताकि कंपनी को घाटा कम करने और कम किराए में सीट देने में मदद मिले। योजना में 9 ऑपरेटर ने सर्विस शुरू की। सरकार ने उन्हें 4,881 करोड़ रुपए की मदद दी। अब 10 साल बाद योजना के तहत आने वाले 95 एयरपोर्ट में से 15 या तो बंद हैं या यहां उड़ान के तहत फ्लाइट बंद हो चुकी हैं। हम इनमें से मध्य प्रदेश के दतिया, गुजरात के भावनगर और हिमाचल प्रदेश के शिमला समेत 9 एयरपोर्ट तक पहुंचे। शुरुआत दतिया से: 11 महीने से फ्लाइट बंद मां पीतांबरा शक्तिपीठ के लिए प्रसिद्ध दतिया में 31 मई 2025 को नए एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ था। यह रेलवे स्टेशन से करीब 4 किमी दूर है। एयरपोर्ट पहुंचने के लिए मुख्य सड़क से मुड़ते ही करीब 200 मीटर का रास्ता साफ-सुथरा मिला। आगे सड़क पर गड्ढे और जगह-जगह गायें दिखीं। सफाई कर्मचारियों ने बताया- ‘जब फ्लाइट उड़ती थी, तब सब ठीक था। अब इन्हें कोई नहीं भगाता।’ एयरपोर्ट को सरकार ने इसे नॉन-ऑपरेशनल घोषित किया है। कभी-कभार VIP फ्लाइट जरूर आती हैं। एयरपोर्ट से करीब 2 किमी के दायरे में ज्यादातर खाली जमीन और इक्का-दुक्का दुकानें मिलीं। होटल संस्कृति पैलेस के मालिक अनुराग गगौरिया बताते हैं, ‘एयरपोर्ट बना, तो लगा कारोबार और होटल में आने-जाने वाले बढ़ेंगे, लेकिन कुछ ही दिन में फ्लाइट बंद हो गई।’ वे बताते हैं कि फ्लाइट भोपाल और खजुराहो जाती थी। भोपाल के लिए दतिया से कई ट्रेनें और बसें चलती हैं। वहीं कारोबार का बड़ा हिस्सा इंदौर से जुड़ा है, लेकिन वहां की सीधी फ्लाइट नहीं थी। यानी एयरपोर्ट बना, लेकिन लोगों की जरूरत के मुताबिक कनेक्टिविटी नहीं बनी। एयर ट्रैफिक कंट्रोलर नितिन ठाकरान बताते हैं, ‘31 मई 2025 को फ्लाईबिग एयरलाइन ने फ्लाइट शुरू की थी। करीब पांच महीने बाद ऑपरेशन बंद हो गया। उम्मीद थी कि यात्री मिलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 19 सीटर विमान भी आधा ही भर पाता था। सिर्फ 1050 लोगों ने सफर किया।’ ‘कंपनी ने अचानक उड़ानें बंद कर दीं। वजह हमें भी नहीं पता। इसके बाद स्काईहॉप एयरलाइन को कॉन्ट्रैक्ट मिलने वाला था। 7 अगस्त से ऑपरेशन शुरू करने की बात कही गई थी, लेकिन अब तक शुरू नहीं हुआ।‘ भावनगर: 18 करोड़ खर्च, कमाई सिर्फ 4 करोड़ गुजरात के भावनगर में कहानी थोड़ी अलग है। यहां एयरपोर्ट ऑपरेशनल है, लेकिन उड़ान योजना की रेगुलर फ्लाइट बंद हो चुकी है। एयरपोर्ट डायरेक्टर तपन कुमार नायक के मुताबिक, उड़ान के तहत स्पाइसजेट सर्विस दे रही थी। 10 जून 2025 को आखिरी फ्लाइट उड़ी। शुरुआती तीन साल सरकार ने सब्सिडी दी। सब्सिडी खत्म होने के बाद एयरलाइन ने ऑपरेशन बंद कर दिया। अभी एक कॉमर्शियल फ्लाइट है, लेकिन वह उड़ान के तहत नहीं है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में एयरपोर्ट के ऑपरेशन और मेंटेनेंस पर करीब 18 करोड़ रुपए खर्च हुए और कमाई सिर्फ 4 करोड़ हुई। शिमला: यहां यात्री नहीं, मौसम सबसे बड़ी चुनौती शिमला से उड़ान योजना की पहली फ्लाइट भले 27 अप्रैल 2017 को उड़ी, लेकिन यहां 6 साल तक हवाई सेवा शुरू नहीं हो पाई। 26 सितंबर 2022 को पहली बार दिल्ली से एलायंस एयर का विमान जुब्बड़हट्टी पहुंचा। इसके बाद भी उड़ानें रेगुलर नहीं हो पाईं। 2025 में भारी बारिश के बाद लगभग 10 महीने ऑपरेशन बंद रहा। हिमाचल हाईकोर्ट के आदेश पर 10 मई 2026 को हवाई सेवा शुरू हुई, लेकिन मानसून शुरू होते ही धुंध की वजह से 24 जुलाई को फिर बंद कर दी गई। 27 अगस्त को यहां आखिरी फ्लाइट पहुंची। एयरपोर्ट डायरेक्टर ललित कुमार के मुताबिक एयरपोर्ट बंद नहीं है। मौसम साफ होने पर उड़ान शुरू की जा सकती है। यहां चुनौती डिमांड से ज्यादा ज्योग्राफी की है। टेबल-टॉप रनवे होने की वजह से यहां बड़े विमान नहीं उतर सकते। टेबलटॉप ऐसा रनवे होता है, जो पहाड़ या ऊंची जमीन को समतल करके बनाया जाता है। रनवे के आसपास खाई होती है। इसलिए विमान के लिए टेकऑफ और लैंडिंग में अतिरिक्त सावधानी जरूरी होती है। जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट से 1998 में पहली कॉमर्शियल फ्लाइट उड़ी थी। अब तक करीब 116 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। रेनोवेशन अब भी चल रहा है। यहां रहने वाले मोहन वर्मा बताते हैं, ‘एयरपोर्ट से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन एक ही फ्लाइट होने से फायदा नहीं हुआ। 4-5 ढाबे खुले, 8-10 टैक्सी ऑपरेटर हैं। बस इतना ही रोजगार मिला है। इनका काम भी तभी चलता है, जब फ्लाइट आती है। मानसून में हर साल ढाई से तीन महीने तक फ्लाइट नहीं उड़ पाती। जहां डिमांड, वहां उड़ान ज्यादा कामयाब
प्रयागराज में यात्री 10 लाख के पार उड़ान की हालत हर जगह एक जैसी नहीं है। उत्तर प्रदेश का प्रयागराज इसका उदाहरण है। 2024-25 में प्रयागराज एयरपोर्ट से 10.77 लाख यात्रियों ने सफर किया। 2023-24 में यह संख्या 6.10 लाख थी, यानी एक साल में करीब 76.4% की बढ़ोतरी। एयरपोर्ट डायरेक्टर गणेश यादव इसके पीछे तीन बड़े कारण बताते हैं। 1. धार्मिक पर्यटन: प्रयागराज में हर साल माघ मेला होता है। हर छह साल में अर्द्धकुंभ और 12 साल में महाकुंभ होता है। संगम के कारण सालभर श्रद्धालु आते हैं। 2. इलाहाबाद हाईकोर्ट: देशभर से जज, वकील, अधिकारी और दूसरे लोग यहां आते-जाते हैं। 3. पॉलिटिकल एक्टिविटी: बड़े नेता और दूसरी हस्तियां लगातार शहर में आती-जाती हैं। असली चुनौती एयरपोर्ट बनाना नहीं, उड़ान चलाते रहना 2014 में देश में 74 ऑपरेशनल एयरपोर्ट थे। 2026 में ये बढ़कर 165 हो गए। सरकार के मुताबिक इस दौरान एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर 1.4 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश हुआ है। फरवरी 2026 में सरकार ने संसद में बताया कि उड़ान के तहत शुरू हुए 15 एयरपोर्ट नॉन ऑपरेशनल थे। इनमें दतिया, शिमला, भावनगर, पठानकोट, लुधियाना, पाकयोंग, कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती और मुरादाबाद जैसे एयरपोर्ट शामिल हैं। इन पर करीब 880 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। रूट की स्थिति भी यही कहानी बताती है। उड़ान के तहत एलायंस एयर, स्पाइसजेट, इंडिगो, स्टार एयर, फ्लाईबिग, फ्लाई 91 और इंडियावन ने सर्विस शुरू की। 669 रूट्स पर कभी न कभी उड़ान शुरू हुई। इनमें से सिर्फ 336 पर उड़ानें चल रही हैं। 333 रूट, यानी करीब आधे बंद हो चुके हैं। दिसंबर 2025 में सरकार ने बताया था कि 151 रूट तीन साल पूरे होने से पहले बंद हो गए। इसकी वजह कम यात्री, एयरक्राफ्ट की शॉर्टेज, खराब विजिबिलिटी और एयरलाइन का ऑपरेशन बंद करना बताया गया। पूर्व पायलट और एविएशन एक्सपर्ट डॉ. विपुल सक्सेना के मुताबिक, उड़ान वाले एयरपोर्ट नॉन ऑपरेशन होने की दो वजहें समझ आती हैं। 1. छोटे शहरों से उतने लोग फ्लाइट में नहीं बैठे, जितनी उम्मीद थी। इससे एयरलाइन के लिए विमान उड़ाना महंगा हो गया। 2. उड़ान के तहत सरकार एयरलाइन कंपनी को शुरुआत के तीन साल मदद देती है। इसके बाद एयरलाइन को अपने दम पर रूट चलाना पड़ता है। सरकारी सब्सिडी खत्म होने बाद एयरलाइंस कंपनियों के लिए उड़ान जारी रखना मुश्किल हो गया। उड़ान योजना का रिजल्ट भले सरकार के मन मुताबिक न रहा हो, लेकिन सरकार इस पर अभी भी दांव लगा रही है। एविएशन मिनिस्टर के. राम मोहन नायडू के मुताबिक, अगले 10 साल में उड़ान के तहत 120 एयरपोर्ट और बनाए जाएंगे। सरकार इन पर 28,840 करोड़ रुपए खर्च करेगी। देश के बाकी नॉन ऑपरेशनल एयरपोर्ट भी जान लीजिए… अमेरिका-कनाडा में भी रीजनल फ्लाइट्स को सब्सिडी अमेरिका, कनाडा, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र वाले देशों में भी दूरदराज इलाकों की एयर कनेक्टिविटी के लिए सरकारी मदद मिलती है। अमेरिका में 1978 में एयरलाइन डिरेगुलेशन के बाद एसेंशियल एयर सर्विस शुरू की गई, ताकि छोटे शहरों की हवाई कनेक्टिविटी खत्म न हो। कनाडा में सरकार एयर सर्विस सपोर्ट प्रोग्राम चलाती है। कोविड के दौरान सरकार ने 18 महीनों में 174 मिलियन कनाडियन डॉलर या करीब 1,199 करोड़ रुपए की मदद दी थी। ताकि दूरदराज वाले इलाकों में हवाई सेवा चलती रहे। ऑस्ट्रेलिया में रिमोट एयर सर्विस सब्सिडी के तहत दूरदराज और कम आबादी वाले इलाकों में रेगुलर हवाई सेवा के लिए सीधे एयर ऑपरेटर को सब्सिडी दी जाती है। ऐसे ही ब्राजील में रीजनल एविएशन को बढ़ावा देने के लिए कानूनी तौर पर सब्सिडी का प्रावधान है। उड़ान मॉडल भी इसी तरह है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों की मदद से लागत कम की जाती है। एयरपोर्ट ऑपरेटर लैंडिंग और पार्किंग चार्ज माफ करते हैं। AAI टर्मिनल नेविगेशन लैंडिंग चार्ज नहीं लगाता। केंद्र और राज्य सरकारें फ्यूल पर लगने वाले टैक्स में छूट देती हैं। एविएशन एक्सपर्ट विपुल सक्सेना कहते हैं, ‘सरकार इस तरह का बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करती है, तो वह आमतौर पर तुरंत रिटर्न या मुनाफे के हिसाब से नहीं सोचती। जैसे सड़क बनाते वक्त भी नहीं सोचा जाता कि पैसा कितने साल में वापस आएगा। यह जरूर देखा जाना चाहिए कि एयरपोर्ट कहां बनाया जाए और वहां किस तरह के विमान चल सकते हैं। …………………………
स्टोरी में सहयोग: चित्रकूट से जितेंद्र कुमार, आजमगढ़ से अजय मिश्रा, भावनगर से भौमिक सिद्धपुरा, प्रयागराज से प्रमोद यादव, कुशीनगर से सूर्यप्रकाश, पठानकोट से नवदीप शर्मा, श्रावस्ती से पंकज वर्मा
………………………… ये खबर भी पढ़ें… NEET- 22 सुसाइड, वादे के बावजूद मुआवजा किसी को नहीं दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के विरोध में 20 जून से शुरू हुआ प्रदर्शन करीब 36 दिन चला। सरकार के तीन वादों के बाद 25 जुलाई को खत्म हुआ। पहला: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। दूसरा: पेपर लीक के बाद खुदकुशी करने वाले छात्रों के परिवारों को एक करोड़ रुपए मुआवजा। तीसरा: सभी प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापस होगी। पहला वादा पूरा हो गया, लेकिन बाकी दो एक महीने बाद भी अधूरे हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

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