Xप्लेन: UP में 10% ब्राह्मणों को लुभाने की जुगत में क्यों BJP-सपा? 'पंडित' कितने अहम
<p style=”text-align: justify;”>उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया खेल शुरू हुआ है. इसका नाम है कि ‘ब्राह्मणों को कौन ज्यादा पटाएगा.’ अयोध्या से लेकर लखनऊ तक, सभी पार्टियों के दफ्तरों में ब्राह्मण चेहरों की भीड़ उमड़ रही है. ताजा मामला अयोध्या का है, जहां समाजवादी पार्टी (सपा) ने ब्राह्मण चेहरे पवन पांडे को अपना उम्मीदवार घोषित करने का संकेत दिया है. आखिर यूपी में ब्राह्मण इतने खास क्यों हैं. क्या सिर्फ 10 फीसदी आबादी वाला समुदाय सरकार बनाने और गिराने का दम रखता है. <em><strong>सबसे अहम सवाल है कि क्या सपा की ‘पंडित’ वाली नई PDA राजनीति, बीजेपी के 30 साल पुराने वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी…</strong></em></p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>सिर्फ 10% आबादी, फिर भी ‘किंगमेकर’ क्यों?</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>यूपी में ब्राह्मण समुदाय की 10% हिस्सेदारी भले ही कम लगे, लेकिन राजनीति में इसकी अहमियत बहुत है. यूपी में करीब 100 से ज्यादा विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण मतदाता हार-जीत का फैसला करने की हैसियत रखते हैं. खासतौर पर 12 जिले तो ब्राह्मण बहुल इलाके हैं, जहां 15 फीसदी से ज्यादा आबादी इसी समुदाय की है. इन जिलों के नाम गौर से पढ़िए क्योंकि यही चुनावी रण का सबसे बड़ा अखाड़ा हैं:</p>
<ol>
<li style=”text-align: justify;”>बलरामपुर</li>
<li style=”text-align: justify;”>बस्ती</li>
<li style=”text-align: justify;”>संत कबीर नगर</li>
<li style=”text-align: justify;”>महाराजगंज</li>
<li style=”text-align: justify;”>गोरखपुर</li>
<li style=”text-align: justify;”>देवरिया</li>
<li style=”text-align: justify;”>जौनपुर</li>
<li style=”text-align: justify;”>अमेठी</li>
<li style=”text-align: justify;”>वाराणसी</li>
<li style=”text-align: justify;”>चंदौली</li>
<li style=”text-align: justify;”>कानपुर</li>
<li style=”text-align: justify;”>इलाहाबाद</li>
</ol>
<p style=”text-align: justify;”>भौगोलिक लिहाज से अवध और पूर्वांचल के ये इलाके राज्य की आधी से ज्यादा विधानसभा सीटों को कवर करते हैं. इन्हीं दोनों क्षेत्रों में ब्राह्मणों का सबसे मजबूत प्रभाव है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ओबीसी और जाटों का दबदबा जरूर है, लेकिन ब्राह्मण और ठाकुर वहां भी ‘की कम्युनिटी’ बनकर खेल बिगाड़ने या बनाने का काम करते हैं.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>2022 के नतीजों का आईना: हर आठवां विधायक कौन था?</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>403 सीटों वाली यूपी विधानसभा में 52 ब्राह्मण विधायक चुनकर आए थे, यानी हर आठवां विधायक ब्राह्मण समाज से था. इनका पार्टी-वार ब्योरा कुछ यूं है:</p>
<ul>
<li style=”text-align: justify;”><strong>बीजेपी:</strong> 46 विधायक</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>सपा:</strong> 05 विधायक</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>कांग्रेस:</strong> 01 विधायक</li>
</ul>
<p style=”text-align: justify;”>वहीं, 49 ठाकुर विधायक भी चुने गए, जिनमें से 43 अकेले बीजेपी के थे, 4 सपा के और 1-1 बसपा और जनसत्ता पार्टी को मिला. ये आंकड़ा बताता है कि बीजेपी ने 2022 में ब्राह्मण और ठाकुर दोनों समुदायों पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बनाए रखी. लेकिन 2026 में इसी पकड़ के कमजोर पड़ने की चर्चा जोरों पर है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>बीजेपी को ब्राह्मणों का साथ कैसे और कब से मिला?</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”><br /><img src=”https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/06/aab2b49498dde9046cb86dc2d2c8815c17860160222611317_original.jpg” /></p>
<p style=”text-align: justify;”>इस टेबल में 2007 से 2012 के बीच बीजेपी की गिरावट पर गौर कीजिए. यही वो दौर था जब ब्राह्मणों ने मायावती का साथ दिया था. लेकिन 2014 में मोदी लहर के साथ ही ये पूरा वोट बैंक वापस बीजेपी के पाले में आ गया. तब से अब तक काफी हद तक बरकरार है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें भले ही 33 रह गईं, लेकिन वोट शेयर 41.67% रहा. यह इस बात का सबूत है कि पार्टी का जनाधार एकजुट है, लेकिन इस बार ब्राह्मणों की नाराजगी इसी जनाधार के लिए खतरा बन रही है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>हर पार्टी ने आजमाया ब्राह्मण फॉर्मूला</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>अब जरा गौर से देखिए कि किस तरह पार्टियों का वोट बैंक तेजी से शिफ्ट हुआ:</p>
<p style=”text-align: justify;”><br /><img src=”https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/06/0b86b7603ebf0574e8dd31652b8d21ff17860165445751317_original.jpg” /></p>
<p style=”text-align: justify;”>ध्यान दें कि 2007 में बसपा को मिली 30% वोट और 206 सीटों की जीत के पीछे मायावती की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ थी, जिसका एक बड़ा हिस्सा ब्राह्मण वोटर थे. 2017 और 2022 में बीजेपी ने 40% से ऊपर का वोट शेयर हासिल करके दिखाया. बीजेपी ने अपने परंपरागत उच्च जाति के वोट बैंक के अलावा ओबीसी और अति-पिछड़ों के एक बड़े तबके को भी साध लिया. सपा का वोट शेयर भी 2017 के 22% से बढ़कर 2022 में 32% हुआ, जो अखिलेश के बढ़ते PDA जनाधार को दिखाता है. अब सपा इसमें ‘P’ यानी ‘पंडित’ को जोड़कर वोट शेयर को और ऊपर ले जाने की फिराक में है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>2007 का जादू 2026 में हर कोई दोहराना चाहेगा</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>मायावती ने 2007 में जो कर दिखाया, वो आज भी राजनीति के पंडितों के लिए केस स्टडी है. उन्होंने दलितों और मुसलमानों के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर ‘सवर्ण-दलित-अल्पसंख्यक’ गठजोड़ का ऐसा फॉर्मूला बनाया कि 16 साल बाद कोई पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटी. तब नारे लगे थे- ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है’ और ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा.’ बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जिनमें से कम से कम 40 जीते थे. इसके साथ ही 61 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 29 ने जीत हासिल की थी.</p>
<p style=”text-align: justify;”>लेकिन 2012 के बाद ये गठजोड़ टूट गया. जाटव दलित (राज्य की 9% आबादी) भले ही बसपा का कोर वोट बैंक बने रहे, लेकिन ब्राह्मणों ने किनारा कर लिया और बीजेपी की तरफ रुख कर लिया. अब 2026 में अखिलेश उसी फॉर्मूले को अपने PDA के साथ दोहराना चाहते हैं.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>2022 के चुनाव में जाति-धर्म के हिसाब से वोटिंग का सच</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>CSDS के आंकड़े गवाह हैं कि किस जाति और धर्म ने किस पार्टी पर कितना भरोसा जताया था:</p>
<figure class=”image”><img src=”https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/06/8199167175589aaecfaa9f17dd3b583f17860169099971317_original.jpg” alt=”Source: CSDS” />
<figcaption>Source: CSDS</figcaption>
</figure>
<p style=”text-align: justify;”>दो बातें बिल्कुल साफ हैं. पहली, बीजेपी का 89% ब्राह्मण और 87% ठाकुर वोट बैंक पर लगभग एकाधिकार है. दूसरी, सपा का मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण 79% और 83% समर्थन के साथ बेहद मजबूत है, लेकिन ब्राह्मणों के बीच उसकी पैठ न के बराबर (6%) है. अखिलेश की पूरी कोशिश 2027 से पहले 89% वाले इस आंकड़े को 6% वाले आंकड़े में थोड़ा सा भी शिफ्ट करने की है, क्योंकि 100 सीटों पर इस शिफ्ट का मतलब सत्ता का गणित पूरी तरह पलटना है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>ब्राह्मणों को साधने की 2026 की सियासी कवायद</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>अब आते हैं उस पूरी कहानी पर जो 2026 में घटित हुई और जिसने अयोध्या से पवन पांडे को उम्मीदवार बनाने तक का सफर तय किया.</p>
<ul>
<li style=”text-align: justify;”><strong>28 फरवरी 2026:</strong> बीजेपी की तरफ से डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के कार्यक्रम में पहुंचे. ये भरोसा दिलाने की कोशिश की कि पार्टी और सरकार ब्राह्मण समुदाय के हितों के लिए फिक्रमंद है. ये संकेत था कि बीजेपी को अपने परंपरागत वोट बैंक की नाराजगी की भनक लग चुकी थी.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>17 जून 2026:</strong> सपा ने लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में ब्राह्मण समुदाय के नेताओं, विधायकों, पूर्व विधायकों, सांसदों और पूर्व सांसदों की एक बड़ी बैठक बुलाई. इस बैठक की कमान खुद अखिलेश यादव ने संभाली और पूरे अभियान की जिम्मेदारी बलिया से सांसद सनातन पांडे को सौंपी. बैठक में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे, विधायक अमिताभ बाजपेई, विनय तिवारी, बैजनाथ दुबे, संतोष पांडे, पूजा शुक्ला और पूर्व विधायक आशुतोष उपाध्याय जैसे कई बड़े ब्राह्मण चेहरों को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई. इसी बैठक में 5 अगस्त को जनेश्वर मिश्र जयंती को बड़े स्तर पर मनाने का खाका तैयार किया गया.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>6 जुलाई 2026:</strong> कानपुर में सपा ने एक बड़ा ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किया. यहां मंच के पीछे लगा बैनर पूरी रणनीति बयां कर रहा था- ‘ब्राह्मण चला अखिलेश के संग.’ इसमें सनातन पांडे और अखिलेश यादव की तस्वीरें साथ-साथ थीं. सम्मेलन में जोर देकर ब्राह्मणों के कथित उत्पीड़न और झूठे मुकदमों का मुद्दा उठाया गया और भरोसा दिलाया गया कि सपा शासन में पूरे समाज को सम्मान और सुरक्षा मिलेगी.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>5 अगस्त 2026:</strong> जनेश्वर मिश्र जयंती के दिन लखनऊ स्थित सपा कार्यालय में ब्राह्मणों का महाकुंभ सा जुटान हुआ. यहां अखिलेश यादव ने अपना सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र चलाया और अपने मूल PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को नया अर्थ देते हुए कहा, ‘लोग PDA की नई-नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, लेकिन वे भूल गए हैं कि PDA में ‘P’ तो ‘पंडित’ का ही शॉर्ट फॉर्म है. जितनी पीड़ा बढ़ाओगे, PDA उतना ही मजबूत होगा.’ इसी मंच से उन्होंने पवन पांडे को अयोध्या से भारी मतों से जिताने की बात कही.</li>
</ul>
<p style=”text-align: justify;”><strong>अखिलेश का नया PDA और सॉफ्ट हिंदुत्व फॉर्मूला</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>ये सब सिर्फ बयानबाजी नहीं थी, इसके साथ एक सोची-समझी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति चल रही है:</p>
<ul>
<li style=”text-align: justify;”><strong>5 फरवरी 2023:</strong> अखिलेश ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘प्रभु राम का रथ, सपा का पथ’ और एक वीडियो शेयर किया जिसमें ट्रक पर भगवान की मूर्ति ले जाई जा रही थी.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>जनवरी 2024:</strong> रामलला प्राण-प्रतिष्ठा का न्योता मिलने पर उन्होंने चंपत राय का आभार जताया और कहा कि वो सपरिवार दर्शन करेंगे.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>5 मई 2026:</strong> अखिलेश ने ‘बड़ा मंगल’ के मौके पर हनुमान जी की तस्वीर और हनुमान चालीसा की चौपाई पोस्ट की.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>19 मई 2026:</strong> ज्येष्ठ माह के बड़े मंगल पर <a title=”लखनऊ” href=”https://www.abplive.com/topic/lucknow” data-type=”interlinkingkeywords”>लखनऊ</a> में भंडारे में शामिल हुए. हनुमान जी की तस्वीर पर माल्यार्पण किया और श्रद्धालुओं को प्रसाद बांटा.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>30 जून 2026:</strong> अखिलेश के जन्मदिन से ठीक पहले पत्नी डिंपल यादव ने बच्चों के साथ वाराणसी में बाबा काल भैरव की महाआरती की और दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती देखी.</li>
<li style=”text-align: justify;”><strong>अप्रैल 2026:</strong> अखिलेश ने अपने गृह जिले इटावा में बन रहे केदारनाथ धाम की प्रतिकृति ‘केदारेश्वर महादेव मंदिर’ में पूजा-अर्चना की.</li>
</ul>
<p style=”text-align: justify;”>ये सब <a title=”योगी आदित्यनाथ” href=”https://www.abplive.com/topic/yogi-adityanath” data-type=”interlinkingkeywords”>योगी आदित्यनाथ</a> के GYAN (गरीब, युवा, अन्नदाता, नारी) और हार्डकोर हिंदुत्व की सीधी काट है, जो ब्राह्मण समेत सभी सनातनी वोटरों को ये भरोसा दिलाने की कोशिश है कि सपा हिंदुत्व विरोधी नहीं है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>यूपी के ब्राह्मण मुख्यमंत्री: वो इतिहास जो बीजेपी को रास आया</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>उत्तर प्रदेश के 21 मुख्यमंत्रियों में से 6 ब्राह्मण रहे हैं और इस सूची में आखिरी नाम कांग्रेस के एन.डी. तिवारी का है, जो 1985 से 1989 तक मुख्यमंत्री रहे. यानी पिछले करीब 35 सालों से कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना है:</p>
<ul>
<li style=”text-align: justify;”>पंडित गोविंद बल्लभ पंत (1937-1954 तक मुख्यमंत्री/प्रीमियर)</li>
<li style=”text-align: justify;”>सुचेता कृपलानी (1963-1967)</li>
<li style=”text-align: justify;”>कमलापति त्रिपाठी (1971-1973)</li>
<li style=”text-align: justify;”>हेमवती नंदन बहुगुणा (1973-1975)</li>
<li style=”text-align: justify;”>श्रीपति मिश्रा (1982-1984)</li>
<li style=”text-align: justify;”>नारायण दत्त तिवारी (1976-1989 के बीच चार बार मुख्यमंत्री)</li>
</ul>
<p style=”text-align: justify;”>ये ऐतिहासिक तथ्य ब्राह्मण समुदाय के मन में हमेशा एक सवाल पैदा करता है कि जो समुदाय राज्य का नेतृत्व करता रहा, उसे आज सिर्फ वोट बैंक की तरह क्यों देखा जाता है. सपा बीजेपी के पारंपरिक ‘ठाकुर-ब्राह्मण’ गठजोड़ में इसी सवाल के जरिए सेंध लगाना चाहती है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>आगे का सियासी गणित: किसे कितना नुकसान?</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>2022 के चुनाव में कुल 75 मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 38 और सपा ने 30 सीटें जीती थीं. हिंदू वोटरों में बीजेपी को 54% और सपा को 26% समर्थन मिला. बीजेपी ने किसान परिवारों के 71% वोटरों में से 47% वोट हासिल किए थे. महिला वोटरों (कुल 6.09 करोड़) ने भी बीजेपी को 46% और सपा को 33% समर्थन दिया.</p>
<p style=”text-align: justify;”>एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अब अखिलेश का दांव इन्हीं समीकरणों को तोड़ने का है. उनका लक्ष्य 89% ब्राह्मण वोट में से एक बड़ा हिस्सा तोड़कर अपने 79% मुस्लिम और 83% यादव वोट के साथ जोड़ना है. ऊपर से सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए ओबीसी और अन्य हिंदू वोटरों को बीजेपी से अलग करना है. अयोध्या से पवन पांडे को उम्मीदवार घोषित करना इसी रणनीति का सबसे सांकेतिक और आक्रामक कदम है, क्योंकि ये सीट <a title=”राम मंदिर” href=”https://www.abplive.com/topic/ram-mandir” data-type=”interlinkingkeywords”>राम मंदिर</a> की वजह से बीजेपी के हिंदुत्व के गढ़ का प्रतीक है.</p>
<p style=”text-align: justify;”>पूरी लड़ाई इस एक सवाल पर आकर टिक गई है, ‘इस बार ब्राह्मण किसके संग?’ क्योंकि यूपी की सत्ता का रास्ता ब्राह्मणों के रुख से होकर ही गुजरता है. इस खेल में 10% आबादी, 100 फीसदी किंगमेकर की भूमिका में है.</p>