ब्लैकबोर्ड-दोबारा NEET ने ली बेटी की जान:‘मोमोज लाऊंगी’, कहकर निकली- नर्मदा किनारे लाश मिली, पिता बोले- पता होता तो डॉक्टर बनने से रोक देता
एक घर में मां बार-बार बंद कमरे का दरवाजा पीट रही थी। अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी। खिड़की से झांककर देखा, तो 19 साल की बेटी पंखे से लटकी हुई थी। अगले ही पल मां-बेटे ने मिलकर उसका शव नीचे उतारा और पूरा घर चीखों से भर गया। करीब 700 किलोमीटर दूर दूसरा परिवार उसी शाम बस अड्डे पर खड़ा हर आने वाली बस में अपनी बेटी को ढूंढ़ रहा था। पिता हर बस रुकवाकर अंदर झांक रहे थे। मां लगातार मोबाइल मिला रही थी। रात बीत गई, लेकिन बेटी नहीं लौटी। अगले दिन उसकी लाश नर्मदा नदी के किनारे मिली। इस बार ब्लैकबोर्ड में मैं नीरज झा कहानी लाया हूं मध्य प्रदेश के दो परिवारों की। दोनों ने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देखा, लेकिन NEET पेपर लीक के बाद दोनों बच्चों ने आत्महत्या कर ली। रीवा शहर से 60 किलोमीटर दूर मऊगंज जिले का मगनिया गांव। यहां एक भी पक्का मकान नहीं हैं। ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए थोड़ा आगे बढ़ने पर एक घर दिखाई दिया। यह कृष्ण कुमार चतुर्वेदी का पुश्तैनी मकान है। मिट्टी, छप्पर और खपरैल का बना। 49 साल के कृष्ण कुमार चतुर्वेदी बताते हैं- ‘अगर मुझे पता होता कि डॉक्टर बनाने का सपना बेटी की जान ले लेगा, तो मैं उसे कभी डॉक्टर बनाने की न सोचता। यह कहते हुए चुप हो जाते हैं। आंखें भर आती हैं। कुछ पल बाद मोबाइल निकालते हैं और बेटी आकांक्षा की तस्वीर दिखाने लगते हैं। रुंधे गले से कहते हैं- अब तो कुछ बचा ही नहीं है। सब बेटी आकांक्षा के साथ चला गया। हंसता, मुस्कुराता चेहरा… अभी चाय पी रहा था, तो आंखों के सामने उसका चेहरा नाचने लगा। कहती थी- पापा अब तो डॉक्टर बन ही जाऊंगी। बस कुछ साल की तकलीफें हैं। पता होता कि उसकी जान एक परीक्षा की वजह से चली जाएगी, तो कभी डॉक्टर बनाने का सपना न देखता। उसे मना कर देता। कम-से-कम जिंदा तो रहती। पेपर लीक के बाद वह उदास रहने लगी थी। पर वो फांसी लगा लेगी…ऐसा भला मैं कैसे सोचता। फांसी लगाने से पहले एक बार तो कुछ बोलती। हमारा चेहरा ही देख लेती कि इस बाप का क्या होगा।’ कृष्ण कुमार बताते हैं- ‘हम परिवार के साथ नागपुर में रहते हैं। 20 मई की बात है। सुबह का वक्त था। मेरी बेटी ने तरबूज और कुछ फल काटकर मुझे खाने को दिए। मार्केट से कुछ काम निपटाकर वापस घर आया, तो वह सो रही थी। मैंने कहा- बेटा खाना खा लो, फिर सोना। बोली- नहीं पापा, नींद बहुत आ रही है। आप खा लो। खाना खाने के बाद मैं, पत्नी और बेटा बरामदे में सो गए। जबकि बेटी सोने के लिए अपने कमरे में चली गई। करीब 2 घंटे बाद, दोपहर के 3 बजे थे। उसकी मां ने पुकारा, लेकिन कमरे से कोई आवाज नहीं आई। कुछ देर बाद गेट ठकठकाया, तब भी कोई आवाज नहीं आई। खिड़की से झांककर देखा, तो वह पंखे से दुपट्टा लगाकर लटकी हुई थी। हाय मेरी आकांक्षा…! यह कहते कृष्ण कुमार फफककर रोने लगते हैं। इस दौरान बारिश शुरू हो जाती है। वह कुछ देर चुप रहकर बताते हैं- ‘कोई अगर कहे कि आपकी बेटी आसमान में मिलेगी, तो मैं उसे आसमान से लाने चला जाऊंगा।’ अगले दिन हम लाश को नागपुर से घर लाए। यहां अर्थी सजी। सभी लाश को प्रयागराज लेकर गए। मुझे साथ नहीं ले गए। अच्छा हुआ वर्ना बेटी की चिता में कूदकर उसी के साथ चला जाता। अब तो लगता है जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं। किसके लिए जीना। एक बेटा है, 15 साल का। उसके लिए सोचता हूं कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो वह और पत्नी किसके सहारे रहेंगे। आकांक्षा 19 साल की थी। 2025 में ही उसने 12वीं किया था। 3 मई 2026 को उसका NEET एग्जाम का पहला अटेम्प्ट था। उस दिन एग्जाम दिलाने मैं ही साथ गया था। जब सेंटर से बाहर आई, तो कहने लगी- ‘पापा 720 नंबर में से 650 तो कोई रोकने वाला नहीं है। पेपर अच्छा गया है। समझो अब आपकी बेटी डॉक्टर बन गई। उसके बाद हम दोनों ने एक दुकान पर साथ में लस्सी पी थी। मैंने मन ही मन सोचा- तब तो मैं डॉक्टर का बाप कहलाऊंगा। मैं उसे प्यार से लल्ला कहता था। एक दिन मैंने यूं ही कहा- लल्ला ये बता, जब तुम डॉक्टर बनोगी, तो डिग्री लेते वक्त जब मैं मंच पर जाऊंगा तो क्या बोलूंगा? यह कि रोटी बनाने वाले की बेटी डॉक्टर बन गई है? दरअसल, मैं नागपुर शादी-ब्याह में कैटरिंग यानी खाना बनाने और परोसने का काम करता हूं। ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं। उस दिन वह हंसकर बोली- पापा मैं आपकी परी बेटी हूं। देखिए कैसे, मेरे गाल पर डिंपल आते हैं। कितनी सुंदर लगती हूं। आपको सब सिखा दूंगी। अंग्रेजी भी। भाई की तो आप चिंता ही मत कीजिए। उसे मैं पढ़ाऊंगी। बस डॉक्टर बन जाने दीजिए, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया।’ इस दौरान कृष्ण कुमार अपनी मोबाइल में आकांक्षा की तस्वीर बार-बार देख रहे हैं। पास में एक पेपर भी लिए हैं, जिस पर कुछ लिखा है। वह रुंधे गले से उस नोट को दिखाते हुए कहते हैं- ‘सुसाइड करने से पहले उसने यही लिखा था- ‘मम्मी-पापा, आपका मुझ पर बहुत भरोसा था कि बेटी डॉक्टर बनेगी, लेकिन दोबारा नीट पेपर देने की हिम्मत नहीं है मेरे अंदर। पहले नीट के पेपर में अच्छे मार्क्स आते, लेकिन दोबारा पेपर अच्छा जाएगा, इसकी क्या गारंटी? सॉरी मम्मी-पापा। मैंने सब बर्बाद कर दिया आप दोनों का…। – स्नेहा’। स्नेहा उसका घर का नाम था। दिनभर में इस नोट को कई दफा पढ़ लेता हूं। उसे याद करके रात-रातभर जगा रह जाता हूं। मेरे हाथ में बहुत दर्द होता है। नींद नहीं आती। पागल सा हो गया हूं।’ यह कहते हुए वह बार-बार अपना दाहिना हाथ सहलाते हैं। पूछने पर कहते हैं- ‘इसमें लकवा मारा गया था, तब से काफी दर्द होता है। दो बार तो हार्ट की सर्जरी हो चुकी है। उसी में 6-7 लाख रुपए लग गए। ये 2020 की बात है। उसी के बाद बेटी ने डॉक्टर बनने की ठानी। कहती थी- पापा आपका इलाज मैं करूंगी। आपके हाथ ठीक कर दूंगी। डॉक्टर बनकर देश की सेवा करूंगी। जिनके पास पैसे नहीं होंगे, उनका फ्री इलाज करूंगी।’ मोबाइल में उसकी तस्वीर दिखाते हुए वह कहते हैं- सोचिए, बाप को छोड़कर ऐसे ही हंसते हुए चली गई। 10-12 लाख रुपए कर्ज है। बेटी की कोचिंग और अपने इलाज के लिए लिया था। अब उसी के बारे में सोचकर मरे जा रहा हूं। अभी तो कोई नहीं मांग रहा, लेकिन कुछ महीने, साल में सब मांगेंगे? बहन से 6 लाख कर्ज लिया था। फिर बैंक से लोन लिया। जब बैंक वाले परेशान करने लगे, तब बड़े भाई से ढाई लाख रुपए लेकर बैंक को चुकाया। अब बाकी लोगों के पैसे कैसे दूंगा? नागपुर कब गए? ‘1993 में। पढ़ा-लिखा कम हूं। कमाने के लिए नागपुर गया। वहां कुछ महीने होटल में काम किया, फिर कैटरिंग का काम करने लगा। शादी-ब्याह में खाना बनाने का। जब बच्चे हुए, तो दिन-रात जाग-जागकर काम किया, ताकि उन्हें पढ़ा सकूं। 2020 के बाद जब हाथ में लकवा मार गया, तब तो सब खत्म हो गया। थोड़ा-बहुत हेल्पर के तौर पर काम कर पाता हूं। इसी से जो कमाई होती, घर चलता था। वहां किराए के मकान में रहता हूं। वहीं आकांक्षा भी नीट की तैयारी कर रही थी। जब हाथ का ऑपरेशन हुआ तो डॉक्टर ने पराठा, ज्यादा तला-भुना खाना खाने से रोक दिया, लेकिन बेटी से चुपके से पराठे मांग लेता था। उस पर वह कहती- गलत बात है पापा। जब आप ठीक हो जाएंगे, तब खूब अच्छा बनाकर खिलाऊंगी। अभी तो सादी रोटी से काम चलाओ। वह मुझे गोल-गोल रोटियां बनाकर खिलाती थी। निक्की यादव की लाश नर्मदा नदी के किनारे मिली इसके बाद अगले दिन मैं इंदौर के मांगलिया इलाके में रहने वाली 18 साल की निक्की यादव के परिवार से मिलने पहुंचा। निक्की ने 21 जून को दूसरी बार हुए नीट परीक्षा के दिन सुसाइड कर लिया। यहां एक दोमंजिला मकान में निक्की की मां इंदु यादव और पिता रामानंद यादव मिले। इंदु मुझे देखकर सिसक-सिसकर रोने लगीं। वह बताती हैं- ’21 जून… यह तारीख अब भी मेरी आंखों के सामने घूमती है। उससे दो दिन पहले, शुक्रवार को मैं और पति शिरडी साईं बाबा के दर्शन के लिए निकले थे। पिछले साल जब उसका NEET क्लीयर नहीं हुआ, तो हमने मन्नत मांगी थी। हम साईं बाबा के दर्शन करके रविवार को करीब 12 बजे घर लौटे। पूरे रास्ते बस यही मना रही थी कि इस बार बेटी का पेपर अच्छा हो जाए। घर पहुंचते ही बड़ी बेटी ने बताया- मम्मी, निक्की परीक्षा देने निकल गई है। उसका सेंटर करीब 50 किलोमीटर दूर मऊगंज में था। परीक्षा दोपहर 2 बजे शुरू होनी थी, लेकिन सेंटर पर 12 बजे तक पहुंचना था। इसलिए वह पहले चली गई। केवल एक कप चाय पी कर परीक्षा देने गई थी। सोचा था लौटकर आएगी तो उसकी पसंद का खाना बनाऊंगी।’ यह कहते हुए इंदु रोने लगती हैं। थोड़ी चुप रहकर फिर बताती हैं- जब भी टीवी या अखबार में किसी छात्र के आत्महत्या की खबर आती तो निक्की कहती- मम्मी, ये लोग सुसाइड क्यों कर लेते हैं? जिंदगी में कोई-न-कोई रास्ता निकल ही आता है। मैं उसकी बातें सुनकर कहती थी- हां बेटा, कभी हार नहीं माननी चाहिए, लेकिन क्या पता था कि वैसा ही कदम मेरी बेटी भी उठा लेगी। 21 जून की सुबह जब निक्की घर से निकल रही थी, तब उसके चेहरे पर एग्जाम का तनाव नहीं, बल्कि हमेशा वाली मुस्कान थी। वह परीक्षा के जा रही थी तो बड़ी बहन से बोली- ‘दीदी या भाई शिवम मुझे एग्जाम सेंटर छोड़ देंगे। वापस बस से आ जाऊंगी। बोली थी- वापस आते वक्त मोमोज लेकर आएगी।’ इंदु की नजर सामने रखी निक्की की तस्वीर पर टिक जाती है। कहती हैं- वह मोमोज लेकर नहीं आई। अब न वह दरवाजा खोलते ही मुझे अब आवाज लगाएगी, न पीछे से आकर मेरे गले से झूलेगी। सोचकर बहुत तकलीफ होती है कि उसे घर से निकलते हुए आखिरी बार देख नहीं पाई। वह बताती हैं- भगवान जानें, उस दिन क्या हुआ। 21 की शाम आखिरी बार उससे बात हुई। 7-8 बजे उसने किसी दूसरे के मोबाइल से कॉल किया, बोली- मम्मी मैं इंदौर आ गई हूं। यहां से अपना घर 15 किलोमीटर दूर है। पापा को बोलना, एक घंटे बाद पंचवटी आ जाएं। मैं बस से आ रही हूं। मेरा फोन बंद हो गया है। इतना कहते हुए इंदु के फिर से आंसू बहने लगते हैं। बगल में बैठी उनकी दूसरी बेटी रूबी यादव कंधे पर हाथ रखकर सहारा देते हुए कहती हैं- ‘निक्की के कमरे में उसकी एक बड़ी-सी तस्वीर फ्रेम कराके अखबार से लपेटी हुई रखी है, लेकिन हमारी हिम्मत नहीं कि उसे दीवार पर टांग दें। ऐसा लगता है, वह किसी कमरे से खिलखिला रही है। वह थोड़ी मोटी थी। हम प्यार से उसे छोटा हाथी कहकर बुलाते थे।’ एग्जाम से एक दिन पहले शाम को निक्की को लेकर हम एक कैफे में डिनर के लिए गए थे। उसे एग्जाम की कोई चिंता नहीं थी। हमने खूब मस्ती की। करीब 2-3 घंटे बाद वापस घर लौटे थे। 21 जून की सुबह उसने थोड़ा-बहुत घर का काम किया। झाड़ू लगाकर बोली- दीदी, अब तैयार होने जा रही हूं। वापस आने के लिए बस का किराया दे दो। मैंने उसे 500 रुपए दिए। बोली- अरे! ये तो ज्यादा हो गया। फिर बोली- चलो मोमोज लेकर आऊंगी। रूबी बताती हैं- हम चार बहनों में वह सबसे छोटी थी। भाई शिवम से बड़ी। उस दिन शिवम सेंटर छोड़ने गया। वापस आते वक्त उसे पानी की बोतल खरीदकर दी थी। शाम 5 बजे उसका एग्जाम खत्म हुआ। 5 घंटे बाद भी जब वह घर नहीं लौटी, तब हमें लगा कि कुछ गड़बड़ है। रात 9 बजे से लगातार उसे 50 से ज्यादा कॉल किए, लेकिन किसी का जवाब नहीं आया। मैंने मैसेज भी किया- ‘निक्की, प्लीज अटैंड दि कॉल’, लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया। इस दौरान मां इंदु सुबकते हुए बोलीं- ‘भइया अब कैमरा बंद कर दीजिए। हम लोगों को मत कुरेदिए। बेटी चली गई… अब क्या ही बात करूं।’ कुछ देर चुप रहकर फिर कहती हैं। उस रात हमने थाने में शिकायत की, तो पुलिस ने उसकी उम्र पूछी। हमने 20 साल बताया, तो कहने लगी- अरे! किसी के साथ भाग गई होगी। आ जाएगी कल तक। उस दिन समय रहते पुलिस छानबीन करती, तो शायद बेटी जिंदा मिल जाती। वो कहती थी- मेरी दो बहनें सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। मैं तो डॉक्टर बनूंगी।’ यह कहते हुए इंदु फिर रोने लगती हैं। अब मैं कैमरा बंद कर देता हूं। घर के भीतर से निक्की के पिता रामानंद यादव आए। वह बताते हैं- ‘ब्रश कर रहा था। हफ्तेभर हो गए हैं ठीक से कुछ खाया-पीया नहीं है। सोचता हूं अगर मैं टूट गया, तो बच्चे, पत्नी… सब बिखर जाएंगे। रात 9 बजे तक वह जब घर नहीं आई, तो मैं अपने बेटे के साथ बस स्टैंड गया। हर बस को रोककर उसमें झांक-झांककर देखने लगा। उधर, बेटी उसे लगातार कॉल कर रही थी। जब आधे घंटे बाद भी कुछ पता नहीं चला, तब आसपास के हॉस्पिटल पहुंचे- यह सोचकर कि कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया। आखिरकार, हारकर लसूड़िया पुलिस स्टेशन गया। पुलिस ने कहा- लोकेशन ट्रेस करने में 24 घंटे लगेंगे। हम वापस घर आ गए। रातभर जागे रहे कि कहीं से कोई अच्छी खबर मिल जाए। सुबह हुई तो फिर से साइबर पुलिस के पास गए। पता चला कि बेटी की अंतिम लोकेशन बड़वाह में मिली है, जो खरगोन जिले में आती है। सोचने लगा कि जब उसने आखिरी बार कॉल किया था, तो बताया था कि वह इंदौर के भंवरकुआं पहुंच गई है। वहां से 85 किलोमीटर दूर आखिर बड़वाह कैसे पहुंच गई? उसके बाद मेरी बेटियों ने बड़वाह के अलग-अलग हॉस्पिटल, थानों में फोन करना शुरू किया। शाम होते-होते पता चला कि खरगोन के महेश्वर में नर्मदा नदी के एक टापू पर 20 साल की लड़की की लाश मिली है। पुलिस ने लाश को रेस्क्यू कर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया था। हम अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टर ने बताया कि मौत 21 जून की रात में ही हो चुकी थी। उसके साथ कुछ गलत नहीं हुआ है। पिंक कलर की सूट-सलवार पहनी लाश…।’, रामानंद यह बताते हुए फफककर रोने लगते हैं। थोड़ी देर बाद कहते हैं- अब उसके कमरे में जाने का दिल नहीं करता। उसकी बनाई हुई पेंटिंग, स्टडी टेबल, कुर्सी, किताब से भरी अलमारी… सब यूं ही पड़ा है। 2024 में उसने NEET का पहला अटेंम्प्ट दिया था। उसका डेंटल के लिए सिलेक्शन भी हो गया था, लेकिन उसने कहा था- पापा MBBS करना है और तैयारी करूंगी। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा था- तुम्हें जितना पढ़ना है, पढ़ो। वह इतना पढ़ती थी कि कई-कई दिन घर से बाहर नहीं निकलती थी। पेपर लीक नहीं हुआ होता, तो मेरी बच्ची आज हमारे बीच होती। नीट का पहला एग्जाम देकर आई थी, तो बोली थी- पापा इस बार क्रैक हो जाएगा, लेकिन 21 जून का पेपर पता नहीं कैसा हुआ। उसकी आखिरी आवाज सुनने को दिल तरस गया। अब तो उसकी आत्मा को शांति तभी मिलेगी, जब हमें पता चल जाएगा कि उस रात मेरी बेटी खरगोन कैसे पहुंची? पुलिस बता रही है कि रैपिडो करके ओंकारेश्वर गई थी। भला इतना दूर कोई रैपिडो करेगा? निष्पक्ष जांच चाहता हूं। ——————————————- ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1- ब्लैकबोर्ड- तानों से परेशान होकर ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाया:ऑडिशन वाले कहते थे- तुम्हारा फिगर ठीक नहीं, अब आधी कमाई सर्जरी की EMI में जा रही एकबार मैं ऑडिशन के लिए गई थी। वहां मुझे ट्रायल के लिए एक बिकिनी दी गई। 10-15 मर्दों के सामने जैसे ही बिकिनी पहनकर बाहर आई, तो सब हंसने लगे। कहने लगे- ‘अरे मैडम, ये सब आपके लिए नहीं है। आप तो एकदम फ्लैट हैं।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भाई का अपहरण किया, जिससे जिंदा साबित हो जाऊं: सिंदूर लगाने वाली पत्नी विधवा पेंशन मांगने पहुंची, लेकिन मुझे जिंदा नहीं माना साल 1975। लाल बिहारी 20 साल के थे। शादी के 10 साल बाद अभी-अभी गौना हुआ था और पत्नी घर आई थी। मां ने कहा- गांव की जमीन गिरवी रखकर बैंक से कुछ लोन ले लो। अपना काम-धंधा शुरू करो, वर्ना आगे बाल-बच्चों को कैसे पालोगे? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें