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आज का एक्सप्लेनर:दुनिया में ऐसा क्या होने जा रहा कि अरबपति बच्चे चीनी भाषा सीख रहे; ट्रम्प की पोती, मस्क के बेटे तक शामिल

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July 3, 2026 4 Min Read
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दुनिया के सबसे अमीर शख्स इलॉन मस्क का एक पोस्ट वायरल है। वो लिखते हैं- मेरा बेटा मैंडरिन (चाइनीज भाषा) सीख रहा है। मई 2026 में मस्क अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ चीन दौरे पर गए, तब भी उनका 6 साल का बेटा चीन की पारंपरिक कढ़ाई वाली जैकेट पहने साथ दिखा था। ट्रम्प की पोती से जुकरबर्ग की बेटी तक, चाइनीज सीखने वाले अरबपतियों के बच्चों की लंबी लिस्ट है। आखिर बच्चों को मैंडरिन क्यों सिखा रहे दुनिया के सबसे ताकतवर लोग; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: किन ताकतवर हस्तियों के बच्चे चाइनीज सीख रहे हैं? जवाब: अलग-मौकों पर इन शख्सियतों के बच्चों के चाइनीज सीखने का खुलासा हुआ… डोनाल्ड ट्रम्प की पोती: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2026 में अमेरिका गए थे। तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की 6 साल की पोती अरैबेला और 4 साल के पोते जोसेफ ने चाइनीज में गाना सुनाया था। इसके बाद रिपोर्ट्स आईं कि अमेरिका में चीनी नैनी की डिमांड बढ़ गई थी। ट्रम्प की बेटी इवांका भी मैंडरिन बोल-समझ सकती हैं। व्लादिमीर पुतिन की पोती: रूसी राष्ट्रपति ने 2024 में बताया था कि उनके घर के बच्चे चीनी बोलते हैं। पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी दिमित्री पेस्कोव की बेटी भी रूसी भाषा से पहले चाइनीज बोलने लगी थी, क्योंकि उसकी नैनी चीनी मूल की थी। मई 2026 में चीन दौरे पर पहुंचे पुतिन ने बताया था कि एक लाख से ज्यादा रूसी चाइनीज सीख रहे हैं। जेफ बेजोस के चारों बच्चेः अमेजन के फाउंडर जेफ बेजोस की पूर्व पत्नी मैकेंजी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके चारों बच्चे मैंडरिन सीखते हैं। किंग चार्ल्स का पोता: ब्रिटेन के किंग चार्ल्स के पोते और राजगद्दी के दूसरे वारिस प्रिंस जॉर्ज को स्कूल में चाइनीज सिखाई गई है। प्रिंस जॉर्ज अभी 12 साल के हैं। मार्क जुकरबर्ग की बेटी: फेसबुक फाउंडर ने 2014 में बीजिंग की सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में छात्रों से चाइनीज में बात की थी। पत्नी प्रिसिला चैन चीनी मूल की हैं। उनकी तीनों बेटियों को शुरुआत से ही अंग्रेजी और चाइनीज सिखाई गई है। बड़ी बेटी मैक्स का तो चीनी नाम भी है। इसी तरह अमेरिकी इन्वेस्टर और लेखक जिम रॉजर्स की 2 बेटियों- हैप्पी और बी रॉजर्स ने मैंडरिन सीखी है। 2017 में दोनों का चीनी गाना गाते हुए वीडियो वायरल हुआ था। रॉजर्स का मानना है कि 21वीं सदी में चीन बहुत जरूरी देश होगा। बच्चों को चीनी वातावरण देने के लिए परिवार सिंगापुर शिफ्ट हो चुका है। सवाल-2: आखिर अरबपतियों के बच्चे चाइनीज क्यों सीख रहे हैं? जवाब: लंदन के किंग्स कॉलेज में चाइनीज स्टडीज के प्रोफेसर केरी ब्राउन के मुताबिक, इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और मैनुफैक्चरिंग हब है। तेज इनोवेशन के साथ ग्लोबल डॉमिनेंस बढ़ा रहा है। अरबपतियों का मानना है कि आने वाला दौर चीन का है, इसलिए वो अपने बच्चों को चीनी भाषा सिखा रहे हैं। इतिहास में भी देश के ताकतवर होते ही उसकी भाषा फैलती रही है… सवाल-3: लेकिन अरबपतियों के बच्चों के चाइनीज सीखने से होगा क्या?
जवाबः बचपन से चाइनीज सीखने के 3 बड़े फायदे हैं…
एलीट नेटवर्किंग: मैंडरिन जानने की वजह से इंटरनेशनल स्कूलों में चीनी रईस और डिप्लोमैट्स के बच्चों से घुल-मिल जाते हैं। बचपन से ही एक ‘ग्लोबल एलीट नेटवर्क’ तैयार होता है, जो भविष्य में काम आता है। मैनहैटन के कैरोसेल ऑफ लैंग्वेजेज की फाउंडर पैट्रिजिया कॉर्मन मानती हैं कि यह बच्चों के भविष्य में एक बड़ा निवेश है। सिर्फ चीन के उभरते बाजार की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी कि चाइनीज दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मातृभाषा है। बच्चे भी इसे सीखना पसंद करते हैं, क्योंकि इसमें ध्वनियां हैं। सवाल-4: अंग्रेजी की तरह क्या अब चाइनीज ग्लोबल लैंग्वेज बनने वाली है? जवाब: इस पर एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय हैं… दरअसल, अंग्रेजी में सिर्फ 26 अक्षर हैं, जिन्हें आसानी से सीखा जा सकता है। जबकि चाइनीज में एक लाख से ज्यादा सिंबल्स हैं। पढ़ने-लिखने के लिए कम से कम 3500 सिंबल्स रटने पड़ते हैं और उन्हें अलग-अलग टोन में सीखना पड़ता है। ये प्रोसेस गैर-चीनी लोगों के लिए काफी कठिन है। कोडिंग, इंटरनेट, एल्गोरिदम, रिसर्च पेपर, ग्लोबल ट्रेड, साइंस जैसे तमाम अहम क्षेत्रों में अंग्रेजी ही ज्यादातर इस्तेमाल होती है। यहां तक कि चीन के कॉलेज-यूनिवर्सिटी और कंपनियों में इंटरनेशनल डायलॉग्स के लिए अक्सर अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में चाइनीज भाषा अचानक से अंग्रेजी को ग्लोबल लैंग्वेज के तौर पर रिप्लेस नहीं कर सकती है। हालांकि भविष्य में इसकी संभावना को नकारा नहीं जा सकता। सवाल-5: हिंदी की स्थिति क्या है, क्या इसे बोलने वाले भी बढ़ रहे हैं?
जवाबः अंग्रेजी और मैंडरिन के बाद हिंदी तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह 37.5 करोड़ लोगों की मातृ भाषा भी है… लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा अंग्रेजी है। 1999 से 2025 के बीच हिंदी के प्राइमरी स्पीकर्स, यानी जिनकी पहली भाषा हिंदी हो, लगभग दोगुने हुए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह आबादी का बढ़ना है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत के 42.2 करोड़ लोग हिंदी बोलते थे, जो 2011 तक बढ़कर 52.83 करोड़ हो गए। यानी 25% से ज्यादा की बढ़त। देश के 85% से ज्यादा हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के हिंदी बेल्ट जैसे- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान वगैरह से आते हैं। हिंदी बेल्ट में जनसंख्या दक्षिण भारत के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ रही है। नतीजतन, 1991 से 2011 के बीच जनगणना में तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी और उर्दू जैसी भाषाओं का हिस्सा घटा, जबकि हिंदी अकेली ऐसी बड़ी भाषा रही जिसका राष्ट्रीय हिस्सा लगातार बढ़ा है। ——— ये खबर भी पढ़िए… पासपोर्ट-आधार भी नागरिकता का सबूत नहीं, फिर कैसे तय होगा कि आप भारत के नागरिक; क्या NRC की तैयारी है ‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है, पूरी खबर पढ़िए…

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