बेटे की सभी हड्डियां टेढ़ी, 4 करोड़ में होगा इलाज:बिस्तर से उठ नहीं पाता, 3 डॉक्टर बोले- आपसी रिश्तों में शादी का असर
8 साल का जावेद स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेलते-खेलते अचानक गिर पड़ा। दोस्तों ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं उठा। जमीन पर पड़ा कराहने लगा। टीचर भागते हुए आए, उन्होंने भी उठाने की कोशिश की। वो बार-बार कहता रहा- मेरे घुटने और कोहनियों में बहुत दर्द है। पैर मुड़ ही नहीं रहे। मैं उठ नहीं पाऊंगा। अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाऊंगा। प्लीज, अम्मी-अब्बू को फोन करके बुला दीजिए। घर पर फोन पहुंचते ही उसके अम्मी-अब्बू फौरन स्कूल पहुंचे। जावेद को गोद में उठाया और लेकर अस्पताल भागे। डॉक्टरों ने कुछ दवाइयां देकर घर भेज दिया। बोले- मांसपेशियां खिंच गई होंगी, कुछ दिन में ठीक हो जाएगा। जावेद की हालत हर दिन और खराब होती चली गई। फिर किसी ने मौलवी के पास जाने की सलाह दी। वहां भी लेकर गए। मौलवी ने 10 हजार की तेल की बॉटल थमा दी। कई हफ्तों तक उस तेल से मालिश की, लेकिन जावेद बिस्तर से नहीं उठा। आज इस बात को 18 साल बीत गए हैं, लेकिन जावेद आज तक बेड से उठ नहीं पाया। कूल्हे, कोहनी, घुटने, कलाई जहां-जहां भी जोड़ (जॉइंट) थे, वहां-वहां सूजन बढ़ती चली गई। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ‘ऐ जिंदगी’ में आज कहानी जावेद की। जिसके लिए मैं नीरज झा पहुंचा हूं गुजरात के अहमदाबाद शहर… जिस जावेद का ऊपर जिक्र किया है, अब उसकी उम्र 26 साल हो चुकी है। जावेद के अब्बू को एक डॉक्टर ने उसका जेनेटिक टेस्ट करवाने की सलाह दी थी। रिपोर्ट में पता चला कि उसे दुर्लभ बीमारी है, जिसका कोई इलाज नहीं है। दरअसल, जावेद के अब्बू की शादी खाला की बेटी से हुई है। करीबी रिश्तों में जब शादियां होती हैं, तो उनके बच्चों में ऐसी बीमारी की संभावना बढ़ जाती है। इस बीमारी को एंजाइम थैरेपी से थोड़ा ठीक किया जा सकता है, लेकिन इसका खर्च हर साल 4 करोड़ रुपए है। जब मैं जावेद के घर पहुंचा तो सुबह के 11 बज रहे थे। लाल-दरवाजे के पास एक घर है। यहां दस्तक देते ही एक बुजुर्ग दरवाजा खोलते हैं। वे अपना नाम- मोहम्मद आजी बताते हैं। घर के अंदर जाते ही किसी के कराहने और चीखने की आवाजें आती हैं। मोहम्मद आजी बताते हैं- ये मेरे बेटे जावेद के कराहने की आवाज है। वे मुझे उसके कमरे में ले गए। जावेद बेड पर लेटा है। दर्द से तड़प रहा है, हांफ रहा है। उसे देखकर लग रहा है मानो, शरीर से हडि्डयां बाहर झांक रही हों। उसके हाथ-पैर टेढ़े हो चुके हैं। वो कुछ देर बाद, उठने की कोशिश करता है, लेकिन दर्द के कारण लुढ़क जाता है। 15 मिनट तक वह कोशिश करता है, लेकिन उठ नहीं पाता। मो. आजी बताते हैं- शादी के दो साल बाद 3 मार्च 2000 को मेरा बेटा जावेद पैदा हुआ। शुरुआत में तो वैसा ही था, जैसे सबके बच्चे होते हैं। जब दो महीने का हुआ, तो धीरे-धीरे शरीर सूखने लगा। सिर भी शरीर के मुकाबले काफी बड़ा लग रहा था। इसकी दादी मजाक में कहती भी थी कि सरदार का बच्चा कहां से पैदा हो गया। डॉक्टर को दिखाया, तो उन्होंने कुछ दवाइयां दे दीं। तीन महीने बाद भी जब कुछ असर नहीं दिखा तो फिर डॉक्टर के पास पहुंचे। उन्होंने बोला कि जब बड़ा होगा तो ठीक हो जाएगा। तबसे हमने ध्यान देना बंद कर दिया। कई बार जावेद चलते-चलते गिर जाता था। हमें लगता था कि पैर कमजोर हैं। मालिश करेंगे तो ठीक हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे इसका शरीर और सूखने लगा। एकबार कुछ रिश्तेदार घर आए और इसे देखते ही बोले- जावेद बड़ा कमजोर है। बीमार है क्या? इसको डॉक्टर को दिखाइए। तबसे हमारी चिंता और बढ़ गई। 2010 की बात है। सूरत में पत्नी की नौकरी लगे दो साल ही हुए थे। जावेद तब तीसरी कक्षा में था। मैं ही इसकी देखभाल कहता था। इसका ट्यूशन घर से 2 किलोमीटर दूर था। एक दिन यह ट्यूशन गया, लेकिन वापस नहीं लौटा। मैं घर पर उसका इंतजार कर रहा था। शाम हुई, तो मेरे जानने वाले शख्स दौड़ते हुए घर आए। बताया- तुम्हारा बेटा रास्ते में गिर गया है, उठ ही नहीं पा रहा है। जोर-जोर से चीख रहा है। मैं पहुंचा तो देखा जावेद बेहोश पड़ा था। उसके घुटने और कोहनियों में बहुत ज्यादा सूजन आ गई थी। उसे घर लाया। पत्नी को फोन करके सूरत से अहमदाबाद बुलाया। पूरी रात हम तेल से मालिश करते रहे, लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। दोबारा डॉक्टर के पास ले गए तो उन्होंने कहा- इसे कोई भी भारी सामान नहीं उठाने देना, यहां तक की स्कूल बैग भी नहीं। आधा किलो से ज्यादा वजन इसका शरीर बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। मोहम्मद आजी बात ही कर रहे थे, तभी जावेद बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा, लेकिन दर्द के कारण वह बार-बार बिस्तर पर ही लुढ़क जा रहा था। 15 मिनट तक उसने कोशिश की, लेकिन उठ नहीं पाया। आखिरकार पिता के सहारे उसने आहिस्ता-आहिस्ता अपने पैर बेड से नीचे लटकाए और चप्पल पहनने लगा। इसके बाद, मोहम्मद उसे वॉशरूम की ओर ले गए। वह किसी बच्चे की तरह पैर घसीटते हुए धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ा रहा है। उसका घुटना जरा सा भी नहीं मुड़ रहा है। झुंझलाते हुए जावेद कहता है- ‘मुझे तो हर दिन आधे घंटे बिस्तर से उठने और आधे घंटे लेटने में लग जाते हैं। इतने दर्द में कहने को तो जिंदा हूं, लेकिन हालत किसी 90 साल के बूढ़े जैसी है। मेरे मां-बाप हैं जो मुझे ढो रहे हैं। उन्ही की वजह से जिंदा हूं। मेरे सारे काम यही लोग करते हैं। ऐसी बेकार जिंदगी है मेरी, 26 साल का हूं फिर भी पापा नहलाते हैं। मुझे शर्म आती है।’ ‘करीब एक साल पहले की बात है। मैं वॉशरूम गया था। अचानक घुटनों और कोहनियों में तेज दर्द उठा। पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। मैं कमोड से उठ नहीं पा रहा था। करीब 15 मिनट तक जूझता रहा, लेकिन उठ नहीं पाया और न ही पैंट पहन पाया। आखिर मैंने चीखते हुए अब्बू को आवाज दी। पहले तो उन्हें मेरी आवाज भी सुनाई नहीं दी। काफी देर बाद जब मैं बाहर नहीं निकला तो वो खुद आए। आवाज देकर पूछा- जावेद तुम ठीक हो? मैंने रोते हुए जवाब दिया- अब्बू मेरा शरीर सुन्न पड़ गया है। घुटने जाम हो गए हैं। मैं उठ नहीं पा रहा हूं। मुझे यहां से बाहर निकालो। अब्बू भागते हुए गए और पड़ोसी को बुलाकर लाए। दोनों ने मिलकर वॉशरूम का दरवाजा तोड़ा। अंदर आए, मुझे पैंट पहनाई और बाहर निकाला। उस दिन के बाद से आज तक, मैंने कभी वॉशरूम का दरवाजा बंद नहीं किया। डर लगता है कि अगर दोबारा वैसा ही दर्द उठा, तो क्या करूंगा।’ मोहम्मद आजी कहते हैं कि- ये एक कदम भी बिना सहारे के नहीं चल पाता। तीन साल पहले की बात है। मैंने घर के पास ही एक दुकान से बिस्किट लाने भेजा। बमुश्किल 500 मीटर दूर। काफी देर तक लौटा नहीं। तब मैंने इसके नंबर पर फोन लगाया। किसी और ने जावेद का फोन उठाकर बोला- आपका बेटा बीच रोड में पड़ा है। इसे यहां से ले जाइए। मैं फौरन जावेद को लेने पहुंचा। उसने बस एक ही रट लगा रखी था- पापा, मर जाऊंगा। जल्दी ले चलो। मैं ऑटो वाले को बुलाकर लाया। जल्दी-जल्दी इसके जोड़ों में तेल और बाम लगाया। दवाई दी, लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। जाने कितने दिनों तक ये तड़पता रहा। तीन महीने तक बिस्तर से नहीं उठा। कूल्हे, कोहनी, घुटने, कलाई जहां-जहां भी जोड़ जॉइंट्स थे, वहां-वहां सूजन बढ़ रही थी। जब आराम नहीं मिला तो हड्डी के डॉक्टरों को दिखाया। उन्होंने जेनेटिक टेस्ट कराने के लिए कहा। दो महीने बाद रिपोर्ट आई, तब डॉक्टरों ने बताया कि जावेद को मार्कियो डिजीज (म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप IV ) है। ये एक जेनेटिक बीमारी है। दुनिया में इसका कोई इलाज नहीं है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, हडि्डयां जाम होती जाएंगी। हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता जाएगा। आंखों की रोशनी कम होती जाएगी। इसके बाद दूसरे अस्पतालों में दिखाया। वहां डॉक्टर ने एंजाइम थैरेपी के बारे में बताया, लेकिन उसका खर्च 3 से 4 करोड़ रुपए सालाना है, जो हमारी हैसियत से कहीं ज्यादा था। अब तक जावेद की बीमारी में 6 से 8 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। इसमें से 50 हजार रुपए तो जेनेटिक टेस्ट में लगे हैं। इसके बाद बेटी हिब्बा और दूसरे बेटे का भी टेस्ट कराया। ये दोनों जुड़वा हैं और जावेद से 4 साल छोटे हैं। जब दोनों की रिपोर्ट आई तो बेटी को भी यही बीमारी निकली, लेकिन छोटा बेटा बच गया। तभी किचन से एक महिला चाय लेकर आती हैं। मोहम्मद कहते हैं- यह मेरी पत्नी अजीजा बानो हैं। अजीजा बताती हैं- हमने जावेद को तीन-चार बड़े डॉक्टरों को दिखाया। सबने एक ही बात कही- करीबी रिश्ते में शादी की वजह से यह बीमारी बेटे को हुई। जावेद के अब्बू मेरी खाला के बेटे हैं। वे कहती हैं- मैं सरकारी टीचर हूं। अभी सूरत में पोस्टिंग है। हर हफ्ते बेटे को देखने के लिए आती हूं। कई बार ट्रांसफर की अर्जी लगाई, लेकिन सरकार में कोई सुनने वाला नहीं है। ऐसी हालत में कौन मां अपने बेटे से दूर रहेगी, लेकिन मुझे रहना पड़ता है। क्या करूं, इसी नौकरी के भरोसे तो पूरा घर चल रहा है।’ बोलते-बोलते अजीजा के आंसू निकल आते हैं। कुछ देर बाद फिर कहती हैं- बेटा कभी-कभी कहता है मेरी शादी करा दो, लेकिन किससे कराएं। कौन लड़की इससे ब्याह करेगी। मेरी बेटी हिब्बा बानो को भी यही बीमारी है। उसके घुटनों में भी हल्का-हल्का दर्द रहता है। हाथ-पैर की उंगलियां हल्की टेढ़ी हैं, लेकिन उसकी हालत इससे थोड़ी बेहतर है। वह 22 साल की हो चुकी है। अपना काम खुद कर लेती है। उसके लिए दो-तीन रिश्ते आ चुके हैं, लेकिन उसकी बीमारी के बारे में सुनते ही सब लौट जाते हैं। दोबारा मुड़कर नहीं देखते। अब डर लगता है कि बेटी की भी शादी होगी या नहीं। मो. आजी कहते हैं- ‘बचपन में जब जावेद को देखता था, तो सोचता था बड़ा बेटा है। बुढ़ापे का सहारा बनेगा, लेकिन ढलती उम्र में मुझे ही इसे सहारा देना पड़ रहा है। इसके सामने मैं खुद अपने घुटनों का दर्द भूल गया हूं। 9वीं तक इसे पढ़ाया। दोस्त हमेशा जावेद से पूछते थे- तुम ऐसे मरे हुए क्यों दिखते हो, कितनी छोटी हाइट है तुम्हारी। तुम इतने कमजोर क्यों हो। जावेद को बहुत बुरा लगता था। इसलिए एक दिन कह दिया कि आगे की पढ़ाई नहीं करूंगा। 2014 में इसने स्कूल छोड़ दिया। उसके बाद धीरे-धीरे इसका शरीर और सूखने लना। कुछ साल पहले तक ये जमीन पर बैठता भी था, अब तो वो भी नहीं। मेरे दोस्त भी कहते हैं- बेटे का इलाज तो करवाओ। अब उन्हें क्या बताऊं कि मेरा बेटा ऐसी बीमारी से जूझ रहा है, जिससे वो कभी जीत नहीं पाएगा। मैंने तो पूरी-पूरी रात जागकर बेटे को दर्द में तड़पते देखा है। जब भी कराहता है तो एक ही दुआ करता हूं, अल्लाह, इसे उठा ले। सच कहूं, तो यह कुछ नहीं कर सकता है। इसके कमर का हिस्सा इतना छोटा है कि बैठ भी नहीं सकता। जावेद को 18 साल से यह दर्द है। इतने सालों में कभी भी रात में मेरी नींद पूरी नहीं हुई। जावेद और हिब्बा की हालत देखने के बाद बतौर रिपोर्टर मैं इस बीमारी से जुड़े सवालों का जवाब पाने के लिए अहमदाबाद के ‘न्यूबर्ग सेंटर फॉर जिनोमिक मेडिसिन’ के जिनोमिक्स डेवलपमेंट एंड इम्प्लीमेनटेशन डिपार्टमेंट पहुंचा। मेरी मुलाकात यहां की डायरेक्टर डॉ. शीतल शारदा से हुई। वह बताती हैं- मार्कियो सिंड्रोम की शुरुआत चुपके से होती है। शुरुआत में एक-दो साल तक माता-पिता को अंदाजा नहीं होता कि उनके बच्चे के शरीर के भीतर कोई बीमारी पनप रही है, लेकिन जैसे ही बच्चा तीसरे साल में कदम रखता है, उसका शारीरिक विकास रुकने लगता है। लंबाई रुक जाती है, हाथ-पैर हल्के-हल्के टेढ़े होने लगते हैं। इस बीमारी से पीड़ित मरीजों की उम्र बमुश्किल 30 से 40 साल होती है। यह बीमारी क्यों होती है? डॉ. शारदा बताती हैं- इंसानी शरीर में करीब 20,000 से 25,000 जीन होते हैं। मार्कियो सिंड्रोम का मुख्य कारण ‘GALNS’ और ‘GLB1’ नाम के दो जीनों में आई छोटी सी गड़बड़ी (म्यूटेशन) है। एक स्वस्थ शरीर में ये जीन एंजाइम बनाने का काम करते हैं, जो भोजन से मिलने वाली शुगर (GAGs) को तोड़कर शरीर से बाहर निकालते हैं। लेकिन मार्कियो सिंड्रोम के मरीजों में ये जीन अपना काम नहीं कर पाते। नतीजा- शुगर के ये बारीक कण यानी GAGs जोड़ों, कॉर्निया, फेफड़ों और हार्ट के वॉल्व के आसपास जमने लगते हैं। इससे आंखें कमजोर होने लगती हैं। हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है। वे बताती हैं- हमारे शरीर में हर जीन की दो कॉपियां होती हैं- एक मां से और एक पिता से। अगर बच्चे को दोनों तरफ से गड़बड़ जीन मिलता है, तो उसे ठीक करने वाला कोई स्वस्थ जीन नहीं बचता। करीबी रिश्तेदारों का डीएनए काफी मिलता-जुलता होता है, इसलिए दोनों साथियों में वही छिपे हुए खराब जीन होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यही वजह है कि करीबी रिश्ते में शादी से ऐसी जेनेटिक बीमारियों का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। वो बताती हैं- हमारी हड्डियों के जोड़ों के बीच एक गद्देदार परत होती है, जिसे कार्टिलेज कहते हैं। यह हड्डियों को आपस में टकराने से रोकती है, लेकिन जब शुगर जोड़ों में जमा होती है, तो कार्टिलेज में सूजन आ जाती है। धीरे-धीरे शरीर के सारे जॉइंट्स (कूल्हा, कोहनी, घुटने) पत्थर की तरह सख्त होने लगते हैं। रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है और हाथ-पैर सीधे नहीं हो पाते। जब भी दो हड्डियां आपस में रगड़ खाती हैं या उन पर दबाव पड़ता है, तो मरीज को तेज दर्द होता है। कई मामलों में तो इंसान पूरी तरह से बिस्तर पर आ जाता है और उसका चलना-फिरना बंद हो जाता है। इसका दुनिया में कोई स्थाई इलाज नहीं है। डॉ. शारदा बताती हैं- ऐसे मरीजों के लिए एंजाइम थैरेपी एक विकल्प है, लेकिन इससे भी बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं होती। इस थेरेपी के जरिए हर हफ्ते इंजेक्शन से एंजाइम शरीर में डाला जाता है। इससे जोड़ों में शुगर कम जमती है। मरीज का दर्द थोड़ा कम होता है और फेफड़े बेहतर काम करते हैं। लेकिन, जो हड्डियां एक बार टेढ़ी या जाम हो जाती हैं, यह उन्हें दोबारा सीधा नहीं कर पाता। यह थेरेपी जिंदगी भर लेनी पड़ती है और खर्च 3-4 करोड़ रुपए है। ————————————- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- उम्र-29, हाइट 3 फीट, खांसने से टूटती हैं हड्डियां: भगवान से हर रोज कहती हूं- मुझसे पहले मेरी बेटी को उठा लेना
तखत पर एक लड़की करवट लिए लेटी है। बाल छोटे-छोटे। लंबाई बमुश्किल 3 फीट, लेकिन उम्र 29 बरस। इस लड़की ने आज तक आइसक्रीम नहीं खाई। जानते हैं क्यों? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- 14 की उम्र में शरीर बना ‘पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…
Source: DB ओरिजिनल | दैनिक भास्कर